Thursday, 5 May 2016

आशय...


कमजोर होने का अब मुझे एहसास हुआ है,
जीते हुए भी मरने का विश्वास हुआ है,
खुद की छाया से भागता हुआ सा अब,
भीड़ में अकेलेपन का मुझे आभास हुआ है।

जुड़ के भी अब टुटा हुआ सा क्यूँ,
नींद से जैसे कहीं भागता हुआ सा हूँ,
नही चलता इंसा का बस खुद की ख़ुशि पे,
इससे ज्यादा बयान अब मैं क्या करूँ।

दुसरे की खुशि से सुख का अंदाजा लगाने से,
अक्सर दुःख होता है ऐसा विश्वास जगाने से,
वैसे तो ये ज़िन्दगी थोडा खोना, थोडा पाना है,
और नहीं कटेगा सफ़र सिर्फ बहाने बनाने से।

क्यूँ सोचता कोई बेमतलब की बात को,
आस भी क्यूँ, ढूंढ के पाने ऐसे साथ को,
ढूंढने और पा जाने में कुछ तो फर्क जरूर है,
नहीं तो क्यूँ खोजता कोई दूसरों में अपने जज्बात को।

क्या बताऊँ, क्या सही, क्या गलत इस राह में,
भागते रहना बेमतलबि में, जाने किसकी चाह में।।

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