Sunday, 3 September 2017

IT’S A LIFE, NOT A…


Not a game to gain, not a waste to drain,

It’s a thing to respect, a dream to inspect,


Not a statement to object, not a ray to project,
It’s a prestige to maintain, a crest to attain,


Not an exam to top, not a class to drop,
It’s a message to pass, a passage to cross,


Not a party to enjoy, not a moment to cry,
It’s a matter to think about, an existence to doubt,


Not a fuel to fire, not a cab to hire,
It’s a time to feel, a shine to steal,


Not a wealth to show, not an ego to grow,
It’s a liability to mind, a target to find,


Not a water to boil, not a confusion to coil,
It’s a crunch to hamper, a baby to pamper,


Not an eminence to portray, not a god to pray,
It’s a benefit to account, a height to mount,


Not a fuse to trip, not a war to creep,
It’s a beauty to praise, a madness to craze...

Saturday, 26 August 2017

### डेरा सच्चा या कच्चा ...


पाखंड की भक्ति,
पाखंड में शक्ति,

बेमतलब की सोच,
लगाए देश पे खरोंच,

बाबाओं के आसन,
खतरे में है शासन,

उजागर हुआ भोग,
तो क्यों नाराज़ हैं लोग,

डेरा अगर है सच्चा,
तो विश्वास कोर्ट पे क्यों है कच्चा,

बन्द करो तोड़-फोड़,
क्यों दरनदिगी में है होड़,

देश है मेरा महान,
यह कहना है बस आसान।

Friday, 18 August 2017

#### ... इंसान हूँ ... ####

कलम में स्याही बहोत फिर भी खून बहाते हैं,
हक की बातें करने वाले किस मुल्क से आते हैं

छोटी-२ बातें क्यों लहू से बड़ी बन जाती है,
जमीन की लड़ाई के मुद्दे भी फिर तलवार बताती है।

चर्चा हर बात की न्यूज़ वाले हर रोज़ ही देते हैं
गली, मोहल्ले के हालात भी अक्सर ऐसे ही होते हैं

याद करते हैं लोग बहोत सी बात अधूरी सी,
नहीं करते हैं जतन कोई जो हो जरूरी सी

नतीज़े की फिक्र के बिना ही आगे बढ़ जाता हूँ,
मुसीबत सामने देख, खुद को कोषता, पछताता हूँ।

अपना परिचय देना भुला नहीं, अब मैं दे ही देता हूँ,
इंसान हूँ, गलतियां कर करके ही सबक मैं लेता हूँ।

Friday, 14 July 2017

### किधर जाऊँगा मैं ###


मुझसे गर मेरी पहचान छीन ली,
टूट के बिखर जाऊँगा मैं,
और मौन हूं तो रहने दो क्योंकि,
बोल दिया तो रुक न पाऊँगा मैं।

मेरा भी है मकसद परचम लहराने का,
टोका तो मुकर जाऊँगा मैं,
और कुछ बातें दबानी है क्योंकि,
राज खोल दिया तो बढ़ न पाऊँगा मैं।

पैतरे मुझे भी कई पता है बेईमानी के,
रोका तो सुधर भी जाऊँगा मैं,
और साख मुझे भी बचानी है क्योंकि,
ठुकरा दिया तो कभी जीत न पाऊँगा मैं।

ठोकरे खाई, उठ के कई बार खड़ा हुआ,
सम्भाला तो आगे बढ़ जाऊँगा मैं,
और जख्म कई छुपाने है क्योंकि,
दिखा दिया तो प्रभाव छोड़ न पाऊँगा मैं।

मंजिल की तलाश में भटक के थक गया,
बताया नही तो किधर जाऊँगा मैं।

और इतने में भी अंत न मिला तो,
कम से कम मिसाल ही बन जाऊँगा मैं।

Monday, 10 July 2017

### निर्दोष भ्रष्टाचार ।।।


मुमकिन है कि हो चाहे इंसान जितना भी निर्दोश,
पर फिर भी क्यों खो देता है अक्सर ही होश,
करता भी है जतन अनेको बिना सोचे ही,
और फिर लगा देता है किसी और पर ही दोष।


और चुनता भी है जो राह दिखे इसे आसान,
हमेशा कोशिश भी करता है बनने को महान,
चुक जाता है गर इतने प्रयत्न करके भी,
तो आखिर छूट ही जाती है जीवन की कमान।


फिर याद आया मुझे की भ्रष्टाचार भी तो जरुरी है,
जिसके बिना न्यूज़ चैनल, चुनावी पार्टियां अधूरी हैं,
बड़े पैमाने पर ही नहीं गली-२ इसका बोल बाला है,
कहते हैं लोग की काम निकालने को ये उनकी मज़बूरी है।


नोटबंदी की जाए या की जाए कोई भी नाकाबंदी,
कोई नही तरीका जिससे आये भ्रष्टाचार गुनाह में मंदी,
लोगों के पैतरे बहोत ही अलबेले और अनेकों हैं,
जहाँ वारदात पे नही शराब बंद होने पे होती है बन्दी।

Friday, 7 July 2017

### आग का दरिया ///!!!




शमा ने परवाने की क्यों राख मांग दी,
जलते हुए परवाने ने भी फिर आग लांघ दी,
ये देखते हुए सिख लो अब तुम भी एक सबक,
सिर्फ शमा के विश्वास को परवाने ने जान दी।

सब जानता हूँ आग है अक्सर ही आगे इस डगर,
तो भी दुब जाता हूँ प्रेम में खो के क्यों मैं मगर,
विश्वास कर या फिर हो कर लाचार मैं भी यहाँ,
क्यों आता नहीं फिर मुझे शमा परवाने का विचार।

सीख के भी कभी इंसान मानता ही तो नहीं,
प्रेम और विश्वास में फर्क जानता भी तो नहीं,
काट के सर किसीका लाश पे होकर खड़े,
खुद की गलती को भी कभी पहचानता तो नहीं।

यही सब सोच मैंने अपनी भाषा बदल दी,
जितनी भी हो सकी अभिलाषा बदल दी,
और जुटा ली पूरी हिम्मत सामना करने को,
तो मुश्किल ने जिंदगी संग मिल परिभाषा बदल दी।

Friday, 18 November 2016

## अंतर !!!


कैसा है ये पैमाना सोच का तेरा,

की दो टूक बात को इस तरह रख दे,
कभी तो आचार तो कभी विचार गलत,
फिर अब देखा तो है अपना समाचार गलत


मौके का फ़ायदा यहाँ सब अपना देख रहे,
नेता भी अक्सर की तरह अपनी रोटी सेंक रहे,
मुश्किल बहोत है फिर भी नतीज़े पे नतीजा,
लोग भी आम इतने की क्या और कुछ भी फेंक रहे।

पत्रकार भी अंग्रेजी हिंदी की चाल बुन रहे,
लोग भी सहूलियत के मुताबिक ही चुन रहे,
नोटबंदी के बीच लोन का नया पन्ना है खुला,
लेकिन लोग माल्या मामले को समझ नही सिर्फ सुन रहे।


अनुरोध है मेरा कि अर्थ-भावार्थ का अंतर समझ लो,
और अलग-२ स्रोतों से जानकारी भी बस महज लो,
अपनी मस्तिष्क का इस्तेमाल भी तो कर ज़रा,
तकलीफ़ें बहोत हैं पर देशहित में फैसला सहज लो।


मीडिया अपने जिम्मेदारी से भटकता दिख रहा,
दिल्ली में भी मोफ्लार वाला बेसोंचे लिख रहा,
ट्विटर को चाहिए की बेबकूफों पे लगाम लगाए,
क्यूंकि सोशल नेटवर्किंग से ही आज का बच्चा सीख रहा।

Sunday, 15 May 2016

भावार्थ....





कोशिश करते-2 ही कभी तो तू कुछ पाएगा, 
मन में थोड़ी आस लिए मंज़िल भी पा ही जाएगा,
मतलबी, बेमतलबि इस सफ़र के दो ये फ़साने हैं,
मैं न बदलूँ, तू न बदले ये वक़्त ही बदल जाएगा ।

कहतें हैं की कर्म करो फल की चिंता कभी न हो,
तो बिन अर्थ के बताओ की ये जीवन कैसे जियो,
क्या कोई खा सके बेस्वाद खान कभी बेस्वार्थ के,
तो सामर्थ कैसे कोई करे मंजिल हो या स्वास् हो ।

और भटक ही जाता है राही करते-२ जतन अनेक,
तो स्वार्थ ही फिर बल बने और जगे शक्ति व विवेक,
चिंता फिर फल की और मंजिल की भी जरुरी है,
न करो कोई धोका कभी, कार्य हो सदैव ही नेक ।

Thursday, 5 May 2016

आशय...


कमजोर होने का अब मुझे एहसास हुआ है,
जीते हुए भी मरने का विश्वास हुआ है,
खुद की छाया से भागता हुआ सा अब,
भीड़ में अकेलेपन का मुझे आभास हुआ है।

जुड़ के भी अब टुटा हुआ सा क्यूँ,
नींद से जैसे कहीं भागता हुआ सा हूँ,
नही चलता इंसा का बस खुद की ख़ुशि पे,
इससे ज्यादा बयान अब मैं क्या करूँ।

दुसरे की खुशि से सुख का अंदाजा लगाने से,
अक्सर दुःख होता है ऐसा विश्वास जगाने से,
वैसे तो ये ज़िन्दगी थोडा खोना, थोडा पाना है,
और नहीं कटेगा सफ़र सिर्फ बहाने बनाने से।

क्यूँ सोचता कोई बेमतलब की बात को,
आस भी क्यूँ, ढूंढ के पाने ऐसे साथ को,
ढूंढने और पा जाने में कुछ तो फर्क जरूर है,
नहीं तो क्यूँ खोजता कोई दूसरों में अपने जज्बात को।

क्या बताऊँ, क्या सही, क्या गलत इस राह में,
भागते रहना बेमतलबि में, जाने किसकी चाह में।।

Monday, 2 May 2016

मानसिकता ...

जरूरतों के मुताबिक कोई बेईमान क्यों,
दिखा देता भीतर बैठे शैतान को क्यों,
क्यों मान लेता नकली दुनिया को सच,
करता कृत्य समाज बर्बाद करने को क्यों।

बिजली की चोरी हो रही है सरेआम,
रोके कोई तो फिर होते हैं कत्लेआम,
पता नहीं जन यहां व्याकुल है या कपटी,
तब तो नेता, चोर, हर आम है एक समान।

कुछ हैं बेरोजगार, जुर्म करने को लाचार,
क्यों नहीं आता इन्हें स्वेत और शांति का विचार,
मांगता ये चन्दा करने को जरूरतें पूरी,
देखा नहीं जिसमे शिक्षा ना ही शिक्षण का आचार।

आज पैदा हुआ भी बदल रहा बिजली के तार,
टोके कोई तो फिर मुड़के करता भी है वार।

गाली देने को यहां मिलते हैं लोग अनेक,
नेता गलत, सिस्टम गलत सब हैं यहां एक।

लेकिन आगे कोई ना आए लेके यहां मशाल,
मानसिकता बदले तो आएगा बदलाव यहां विशाल।

मानसिकता बदले तो बदले समाज


बहुत दुःख होता है जब लगता है की सुनने वाला सुन्ना ही नहीं चाहता, किसी कार्यवाही की संभावना तो तब बने जब कोई काम करने की मनसा रखता हो, अपने हर एक कृत्य में खुद को गुनहगार समझता हूँ, क्युकिँ गुनाह का साथ नहीं दे रहा ना ही किसी भी प्रकार से भागीदार हूँ लेकिन देख रहा हूँ की हो रहा है और शांत बैठा हूँ तब भी किसी किसी मायने में गुनाह का भागीदार तो हूँ ही, और कोई नई बात नहीं लिख रहा बल्कि ध्यान आकर्षित कर रहा हूँ की क्यों चुप है हम |
एक वाकये से बयान करता हूँ कुछ वर्ष पहले मैं एंट्रेंस एग्जामिनेशन के लिए बर्नपुर, वेस्ट बंगाल गया था, दूर के किसी रिश्तेदार के यहां ठहरा था गर्मियों के दिन थे, दो दिन पहले पहुंच गया था, एक शाम किसी कारण बिजली चली गयी और कोई छुट्टी का दिन था, गर्मी के मारे हालत खराब थी, रात भर बिजली नदारद रही, बड़ी मुश्किल में रात कटी, रात भर सोचता रहा की अगर घर पे रहता तो कुछ कुछ जुगाड़ से काम हो ही जाता, सुबह उठ के पता चलता है की अभी और इंतज़ार करना है क्युकिँ सरकारी बिजली कर्मचारी को आने में समय लगेगा, मुझे तो धक्का लग गया, क्या ऐसा भी कोई कर्मचारी होता है या उससे बुलाया जा सकता है, तो फिर मेरे घर के आस पास ऐसा क्यों नहीं होता, क्यों लोग खुद ही सारे काम कर देना चाहते हैं, बहुत सोच के निन्मलिखित विकल्प निकले :
) शायद यहां के लोग हर काम में माहिर हैं,
) इंतज़ार करना पसंद नहीं करते,
) क्या कर्मचारी कामचोर हैं या आनाकानी करते हैं,
लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली, शाम को ऐसे ही छत पे खड़ा था तो कोई लड़का आके डंडे से तार फंसा के बिजली वाले खम्बे पे लगा रहा है, देखा की सबके तार वैसे ही लगे हुए हैं, लगातार यही दृश्य रोज देखने को मिला वो लड़का आता अपना काम करता और चला जाता, सोचा जब सबके तार लगे हुए हैं तो वो रोज आके अपना तार क्यों लगता है एक दिन लगा के छोड़ भी तो सकता है, कुछ खोज करने पे पता चला की वो बिजली की चोरी कर रहा है और ऐसा करने वाला वो एक नहीं मेरे मोहल्ले के कई लोग हैं|

अब सोचता हूँ क्या मेरी पढाई पैसा कमाने के लिए ही है या मुझे समाज की दशा को सुधारने में भी भागिदार होना चाहिए

कृपया कुछ सुझाएं|